दोनों मुल्कों के बीच बातचीत वक्त की जरूरत


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने लोकसभा चुनाव में दूसरी बार भारी जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी और उम्मीद जताई कि भारत-पाक संवाद की प्रक्रिया जल्द ही दोबारा शुरू होगी। इमरान ने लोकसभा चुनाव के दौरान भी कहा था कि नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने पर भारत-पाक रिश्तों में सुधार संभव है। अब देखना है कि नई सरकार का इस मामले में क्या रुख होता है। दोनों मुल्कों के बीच बातचीत वक्त की जरूरत है, लेकिन इस मामले में कुछ चीजें शुरू में ही साफ हो जानी चाहिए, ताकि पुरानी गलतियों से बचा जा सके। दरअसल भारत-पाक संबंधों में काफी समय से एक या दूसरी तरह का अतिरेक देखा जा रहा है। जब भी रिश्ते सामान्य होने शुरू होते हैं, दोनों तरफ कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं देखने को मिलती हैं। व्यापारिक, सांस्कृतिक, ऐकडेमिक, फिल्मी, हर तरह का आदान-प्रदान शुरू हो जाता है। ट्रैक-टू डिप्लोमेसी मुख्यधारा के राजनय पर हावी हो जाती है।
राजनेता भी अपनापन दिखाने के नए-नए तरीके ढूंढने लगते हैं। लगता है, एक झटके में सारी दीवारें गिर जाएंगी और रातोंरात एक नया इतिहास बन जाएगा। लेकिन इस प्रक्रिया का ऐंटी-क्लाइमेक्स कभी पाकिस्तानी फौज की किसी खुली या गुप्त हरकत या फिर एक भीषण आतंकवादी घटना के रूप में सामने आता है और एक ही झटके में सारी कोशिशों पर पानी फिर जाता है। देखते-देखते दोनों देश एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। याद करें तो जनरल जिया उल हक के दौर में- जब दोनों देशों के बीच न बहुत गर्मजोशी थी न बहुत तनाव- हमारा रिश्ता ज्यादा संतुलित था। हालात बिगडऩे पर बातचीत से मामला संभल जाता था, क्योंकि दोनों की एक-दूसरे से अपेक्षाएं बहुत कम थीं। 
आज फिर हमें अपने रिश्तों को व्यावहारिक धरातल पर ही देखना चाहिए। बातचीत शुरू करें, लेकिन यह आशा छोड़कर कि इससे आतंकवाद की समस्या हल हो जाएगी या कश्मीर की गुत्थी सुलझ जाएगी। छोटे लक्ष्य रखे जाएं। जैसे वार्ता से फिलहाल सीमा पर तनाव कम हो सकता है और सरहद पर रहने वाले दोनों तरफ के लोगों का रोजमर्रा का जीवन सामान्य हो सकता है। फिर स्थानीय स्तर पर थोड़ा-बहुत कारोबार शुरू हो जाए तो माहौल सुधारने के लिए यह भी कम नहीं है। सहोदर भाई का आदर्श अगर हमसे नहीं सध पा रहा तो शांतिपूर्ण पड़ोसी की तरह रहने की कोशिश क्यों न करें? चीन के साथ हम दशकों से ऐसे ही रहते आ रहे हैं। उसके साथ सीमा विवाद आज भी 1962 के युद्ध वाले मुकाम पर ही टिका है। लेकिन हमने इस झगड़े को पिटारे में बंद करके आपसी कारोबार को बढ़ावा दिया। नतीजा यह कि चीन आज हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। चीनी नेता तंग श्याओफिंग ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी से कहा था कि टकरावों का समाधान हमें अगली पीढिय़ों पर छोड़ देना चाहिए। यह कहानी भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भी क्यों न

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